अदार पूनावाला: द वैक्सीन किंग (कोरोना वैक्सीन )
सितंबर, 2020 में जब दुनिया भर में कोरोना वैक्सीन को तैयार करने और इंसानों पर उसके परीक्षण की शुरुआत हुई तब हमने पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट का दौरा किया था. कोरोना वैक्सीन बनाने के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका से समझौता किया हुआ था.
सीरम इंस्टीट्यूट कोविशील्ड वैक्सीन का भारत और दुनिया के दूसरे देशों में सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. हमलोग जिस दिन सीरम इंस्टीट्यूट के कैंपस में गए थे, उसी दिन से प्लांट में बड़े पैमाने पर कोविशील्ड का उत्पादन शुरू हुआ था.
हालांकि, तब तक दुनिया के किसी हिस्से में कोविशील्ड का इंसानों पर परीक्षण नहीं हुआ था और किसी भी सरकार ने वैक्सीन को मंज़ूरी नहीं दी थी.
लेकिन दुनिया भर में कोरोना संक्रमण को लेकर आपातकालीन स्थिति को देखते हुए अनुमति मिलने से पहले ही कोविशील्ड का जोख़िम भरा उत्पादन शुरू किया गया था. परीक्षणों में वैक्सीन की नाकामी की सूरत में ये सब बेकार हो जाता, लेकिन उस वक़्त दुनिया के सामने इतना जोख़िम उठाने के अलावा दूसरा विकल्प मौजूद नहीं था.
इस दौरान सीरम इंस्टीट्यूट के एक अधिकारी ने कहा, "आइए आपको एक दूसरी जगह ले चलते हैं. सीरम कैंपस के अंदर ही एक फ्लाइओवर था जो सीरम इंस्टीट्यूट के अंदर इकलौती प्राइवेट रोड थी जो सीधे उस दूसरी जगह ले जा रही थी. वहां पहुँचने से पहले एक विशाल हेलीपैड दिखाई दिया, वहां एक हेलिकॉप्टर भी पार्क था. साथ ही एक बड़ा यात्री विमान भी वहां दिखाई दे रहा था. वह विमान कोई चार्टेड विमान नहीं था बल्कि एयरबस 320 का विमान था."
हमें तो यह समझ नहीं आया कि हमलोग सीरम प्लांट के अंदर थे अचानक एयरपोर्ट कैसे पहुँच गए. लेकिन साथ चल रहे अधिकारी ने हमें बताया, "यह अदार पूनावाला का दफ़्तर है. यह विमान यहां स्थायी तौर पर रहता है और इसे पूनावाला अपने दूसरे दफ़्तर के तौर पर इस्तेमाल करते हैं."
इस हेलिपैड से सटी इमारत काफ़ी हद तक एयरपोर्ट टर्मिनल से मिलती जुलती थी. इस दफ़्तर का नाम भी था- टर्मिनल वन. उस दिन पूनावाला पुणे में नहीं थे, इसलिए हम दफ़्तर के अंदर नहीं जा सके लकिन हमने बाहर से ही उनके दफ़्तर का स्टाइल देखा.
हमने इन दो जगहों पर जो देखा उसमें एक तरह से पूनावाला के साम्राज्य का सूत्र दिखाई दिया. एक तरफ़ जहां दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले बाज़ार पर नज़र दिखी तो दूसरी ओर निवेश के लिए जोख़िम उठाने का भाव दिखा जिसके ज़रिए पूनावाला अपने साम्राज्य को बढ़ा रहे हैं.
सीरम इंस्टीट्यूट के सामने चुनौती
कोरोना संक्रमण के आने के साथ ही पूनावाला और सीरम इंस्टीट्यूट का नाम हर किसी की ज़ुबान पर चढ़ गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख से लेकर गांव के लोगों को सीरम इंस्टीट्यूट के वैक्सीन का इंतज़ार था. भारत दुनिया में सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक है, लेकिन इसके बारे में पुणे में भी लोगों को मालूम नहीं था.
सीरम इंस्टीट्यूट के सामने दुनिया भर की वैक्सीन की माँग को पूरा करने की चुनौती है, वह भी ऐसे समय में जब दुनिया का अस्तित्व वैक्सीन पर टिका है. यह काफ़ी कम समय में तैयार हुआ है, कह सकते हैं कि आधुनिक मेडिसिन के दौर में सबसे तेज़ी से यह वैक्सीन तैयार हुई है. जब दुनिया भर में कोरोना वैक्सीन के लिए कई प्रोजेक्ट पर काम चल रहा था तब लोगों की नज़र ऑक्सफ़ोर्ड-ऐस्ट्राज़ेनेका पर टिकी हुई थींसीरम इंस्टीट्यूट ने जब शुरुआती दौर में ही ऐस्ट्राज़ेनेका के साथ अनुबंध किया तब भारत ने भी राहत की साँस ली थी. सीरम ना केवल कोविशील्ड का उत्पादन कर रहा है बल्कि वह अपनी दो कोरोना वैक्सीन विकसित करने पर भी काम कर रहा है, जिसमें नोवावैक्स भी शामिल है.
भारत में जनवरी, 2021 से वैक्सीनेशन शुरू हुआ और वैक्सीन ढोने वाले कंटेनरों के साथ अदार पूनावाला की तस्वीर मीडिया की सुर्ख़ियों में देखने को मिली. भारत में कोविशील्ड को कोवैक्सीन के साथ मंज़ूरी मिली. कोविशील्ड के साथ बड़ा सर्कुलेशन का सिस्टम मौजूद है, इसलिए यह भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में सबसे ज़्यादा वितरित वैक्सीन है. सीरम इंस्टीट्यूट के प्लांट में तैयार कोविशील्ड वैक्सीन के करोड़ों डोज़ भारत से बाहर भी भेजे गए.
जिन दूसरे देशों ने कोरोना वैक्सीन के लिए भारत से समझौता किया है उन्हें कम से कम साल के अंत तक इंतज़ार करना होगा. देश के अंदर भी वैक्सीनेशन की प्रक्रिया धीमी है. ऐसे में एक बार फिर से सीरम इंस्टीट्यूट और पूनावाला उम्मीद और आलोचनाओं के केंद्र में हैं.
अदार, अपने पिता सायरस और परिवार के साथ लंदन जा चुके हैं. अफ़वाह यह भी है कि वे धमकियों के चलते बाहर गए हैं, हालांकि उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया है. उन्होंने ब्रिटेन में एक बड़े निवेश की घोषणा भी की है.
ऐसे में लोगों की दिलचस्पी यह जानने में हो सकती है कि पूनावाला और सीरम के साम्राज्य की कहानी कहां से शुरू होती है?
घोड़ों के व्यापार से वैक्सीन के व्यापार तक
यह कहा जाता है कि पूनावाला का परिवार ब्रिटिश राज के दौरान 19वीं शताब्दी में पुणे आया. कई पारसी परिवार ब्रिटिशों के शासन के दौरान भारत में बसे और प्रशासन से लेकर कारोबार तक की दुनिया में स्थापित हुए. पारसी परिवार जहां बसे उन शहरों के नाम उनके नाम में देखने को मिलते हैं. उसी तरह से अदार के परिवार का नाम पूनावाला पड़ा.
स्वतंत्रता से पहले के दौर में यह परिवार कंस्ट्रक्शन के कारोबार में था. लेकिन उससे ज़्यादा इनका नाम घोड़ों के कारोबार से हुआ, आज भी इस परिवार को घोड़ों के कारोबार से लोग जानते हैं. घोड़ों का कारोबार अदार के दादा सोली पूनावाला ने शुरू किया था.
उन्होंने घुड़साल बनाया जिसमें उन्नत क़िस्म के घोड़ों को रेस के लिए तैयार किया जाता था. ब्रिटिश अधिकारी, बड़े उद्योगपतियों से इस परिवार का रिश्ता घोड़ों के कारोबार के ज़रिए बना. पूनावाला साम्राज्य की नींव इसी कारोबार से पड़ी.
लेकिन वैक्सीन बनाने वाले सीरम इंस्टीट्यूट की शुरुआत कैसे हुई? दरअसल इसका कनेक्शन भी घोड़ों के कारोबार से जुड़ा हुआ था. अदार के पिता सायरस ने जब घोड़ों के कारोबार को बढ़ाने के बारे में सोचा तो उनका ध्यान एक ऐसी इंडस्ट्री पर गया जिसके बारे में ज़्यादा जानकारी मौजूद नहीं थी और ना ही कोई भविष्य की गारंटी दे सकता था.
लेकिन सायरस ने यह जोख़िम उठाया और वैक्सीन बनाने के कारोबार में क़दम रखा. यह वह दौर था जब भारत में सीमित स्तर पर वैक्सीन का उत्पादन होता था और उसमें भी सरकार की भूमिका ज़्यादा होती थी.
तब मुंबई में हाफ़किन इंस्टीट्यूट वैक्सीन का उत्पादन करती थी. पूनावाला के फ़र्म से जो घोड़े बूढ़े हो जाते थे उनका इस्तेमाल सर्पदंश और टिटनेस का टीका बनाने में होता था. इसकी वजह यह थी कि घोड़ों के रक्त में मौजूद सीरम से एंटीबॉडी का निर्माण किया जाता था. सायरस की नज़र इस पर गयी तो उन्होंने अपने घोड़ों का इस्तेमाल ख़ुद ही करने का फ़ैसला लिया.
सायरस पूनावाला ने टीवी टुडे को एक इंटरव्यू में बताया है, "हमलोग अपने घोड़ों को मुंबई के हाफ़किन इंस्टीट्यूट को दिया करते थे. वहां के एक डॉक्टर ने मुझे बताया कि आपके पास घोड़े हैं, ज़मीन है. अगर आप वैक्सीन उत्पादन में आना चाहते हैं तो आपको केवल एक प्लांट स्थापित करना है."
इस सलाह में उन्होंने नई इंडस्ट्री के लिए अवसर देखा. 1966 में उन्होंने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया की स्थापना की.
यह वह दौर था जब भारत सहित दुनिया भर में संक्रामक बीमारियों के ख़िलाफ़ सरकारें टीकाकरण का अभियान चला रही थीं, जिसके चलते वैक्सीन रिसर्च, उसके विकास और उसके इस्तेमाल पर ध्यान दिया जा रहा था. जल्द ही सीरम इंस्टीट्यूट ने कई बीमारियों के लिए वैक्सीन का उत्पादन शुरू कर दिया.
हाफ़किन इंस्टीट्यूट के कई रिसर्चर सीरम आ गए. 1971 में विकसित खसरा और कंठमाला रोग के टीके प्रभावी रहे. जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया गया, सीरम ने इस कार्यक्रम को अवसर के तौर पर देखा. सीरम ने यूरोप और अमेरिकी तकनीक लाकर अपना उत्पादन बढ़ाया और उत्पादों की क़ीमत सस्ती रखी.
हालांकि सामाजिक स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम, मसलन टीकाकरण आज भी सरकार के हाथों में है, ऐसे में हर किसी को सरकार के प्रावधानों और अवरोधों का सामना करना पड़ता है, सीरम को भी इससे गुज़रना पड़ा.
सायरस पूनावाला ने एक इंटरव्यू में बताया है, "कई तरह के परमिट हासिल करने होते थे, उसमें महीनों और सालों लगते थे. पहले 25 साल तो काफ़ी मुश्किल भरे रहे. इसके बाद हमारी वित्तीय स्थिति बेहतर हुई. पेपरवर्क करने के लिए हमारे पास उपयुक्त लोगों की टीम थी जो दिल्ली जाकर सरकारी अधिकारियों के रहमो-करम पर काम करते थे. ऐसी ही स्थिति आज भी है. अगर इन सरकारी अधिकारियों का ख़याल नहीं रखा जाए तो परमिट हासिल करने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है. हालांकि इतने सालों के बाद सीरम इंस्टीट्यूट के आवेदन को संदेह की नज़र से नहीं देखा जाता है."
सायरस के समय में ही सीरम इंस्टीट्यूट का वैक्सीन उत्पादन में दबदबा स्थापित हो गया. वह दुनिया भर के देशों में वैक्सीन की आपूर्ति करने लगी और सायरस की गिनती दुनिया के अमीर लोगों में होने लगी.
सायरस ने सीरम इंस्टीट्यूट की शुरुआत पाँच लाख रुपये से की थी और फ़ोर्ब्स की सूची के मुताबिक़ वे दुनिया के 165वें नंबर के अमीर शख़्स हैं. फ़ोर्ब्स इंडिया की सूची के मुताबिक़ वे भारत के छठे सबसे अमीर आदमी हैं.
अदार का दौर और 35 देशों से 165 देशों में फैला कारोबार
अदार पूनावाला इंग्लैंड से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 2001 में सीरम इंस्टीट्यूट से जुड़े. पहले उन्होंने सेल्स विभाग से काम शुरू किया. आज की तारीख़ में बदलते और विस्तृत होते सीरम समूह पर अदार की छाप ज़्यादा दिखती है, उनके पिता की कम. सायरस के दौर तक सीरम मुख्यतौर पर भारत में ही सक्रिय था.
2011 में अदार पूनावाला सीरम समूह के सीईओ बने. इसके बाद उन्होंने दो चीज़ों पर ध्यान केंद्रित किया है- उन्होंने एक तो उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दिया और सीरम के ज़रिए दुनिया के ज़्यादा से ज़्यादा देशों में वैक्सीन आपूर्ति पर ध्यान दिया.
विस्तार करने की योजना के तहत सीरम ने 2012 में डच सरकारी वैक्सीन निर्माता कंपनी का अधिग्रहण कर लिया. इसके बाद दुनिया की नज़र में सीरम आ गया क्योंकि इसके बाद कंपनी दुनिया भर में सबसे ज़्यादा वैक्सीन उत्पादित करने वाली कंपनी बन गई.
2001 में सीरम 35 देशों को वैक्सीन की आपूर्ति किया करता था, आज की तारीख़ में सीरम दुनिया भर के 165 देशों में वैक्सीन की आपूर्ति करता है.



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